छंद - दिग् पाल
समांत - मुखड़ा - आएँ
अंतरा -- उन, अल, ऊटे, आसी --!
गीत -------
बिछुडे़ नहीं सुजन अब सपने नयन सजाएँ।
चाहत यही हमारी मिलती रहें दुआएँ।
ऋतुराज आगमन हो गाती बहार गुन गुन,
राहें निखारतीं जो कलिका विलास रुनझुन,
महका करे चमन यह सजती रहे दिशाएँ ।
चाहत यही हमारी मिलती रहें दुआएँ।
उजड़े न माँग कोई सूना न मात आँचल,
खोये नआस बचपन आँसू बहे न काजल,
आतंक जो धरा पर जड़ से उसे मिटाएँ ।
चाहत यही हमारी मिलती रहें दुआएँ।
सपने सँवारतीं वह दर्पण कभी न टूटे ,
निश्चित विजय हमारी यह हौसला न छूटे,
विश्वास हर हृदय में साहस यही दिलाएँ ।
चाहत यही हमारी, मिलती रहें दुआएँ।
अनुभूति नेह की हो रंचक न हो उदासी,
सदियाँ से है निहारे यह प्रेम छंद प्यासी,
अनमोल है नयन के आँसू नहीं बहाएँ ।
चाहत यही हमारी मिलती रहें दुआएँ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
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