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छन्द- किरीट सवैया (मापनीयुक्त वर्णिक)
वर्णिक मापनी - 211 211 211 211 211 211 211 211
अथवा लगावली- गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल
पारंपरिक सूत्र - भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस (अर्थात भ भ भ भ भ भ भ भ)
एक नदी द्वय पाट सदा सम भाग्य नहीं सुख पावन मोहक ।
पार लगा जन जीवन को तरणी जल नृत्य लुभावन मोहक ।
सत्य यही जन भूल न हो तन श्वांस रहे जग रीत सुधाकर ।
दास सदा भव भीत रहे मन आस जगा नव जीत सुधाकर
सोहत छंद किरीट लुभावन मस्तक शोभित भाल
हिमालय ।
मुग्ध करे मन शृंग सुहावन चादर श्वेत कपाल हिमालय ।
सागर पाँव पखार रहा करती लहरें करताल हिमालय ।
रक्षक भारत भूमि सखा वत जीवन का प्रतिपाल हिमालय ।
दीन नहीं मजबूर नहीं मन से न फकीर अधीर बनें अब।
घेर रहा कलिकाल उसे हम खींच लकीर सुवीर बनें अब ।
हाथ मशाल उठा निकलें हम धर्म धरा पर भीर हरें सब ।
झूम बयार बसंत चले दुखदायक जीवन पीर हरें सब ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
छन्द- किरीट सवैया (मापनीयुक्त वर्णिक)
वर्णिक मापनी - 211 211 211 211 211 211 211 211
अथवा लगावली- गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल
पारंपरिक सूत्र - भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस (अर्थात भ भ भ भ भ भ भ भ)
एक नदी द्वय पाट सदा सम भाग्य नहीं सुख पावन मोहक ।
पार लगा जन जीवन को तरणी जल नृत्य लुभावन मोहक ।
सत्य यही जन भूल न हो तन श्वांस रहे जग रीत सुधाकर ।
दास सदा भव भीत रहे मन आस जगा नव जीत सुधाकर
सोहत छंद किरीट लुभावन मस्तक शोभित भाल
हिमालय ।
मुग्ध करे मन शृंग सुहावन चादर श्वेत कपाल हिमालय ।
सागर पाँव पखार रहा करती लहरें करताल हिमालय ।
रक्षक भारत भूमि सखा वत जीवन का प्रतिपाल हिमालय ।
दीन नहीं मजबूर नहीं मन से न फकीर अधीर बनें अब।
घेर रहा कलिकाल उसे हम खींच लकीर सुवीर बनें अब ।
हाथ मशाल उठा निकलें हम धर्म धरा पर भीर हरें सब ।
झूम बयार बसंत चले दुखदायक जीवन पीर हरें सब ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
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