Sunday, January 13, 2019

 गीतिका (आधार छंद 'गीतिका' )
2122  2122  2122  212 अथवा
गालगागा गालगागा गालगागा गालगा
समान्त- आनी, पदान्त - हो गयी


बह रहीं कैसी हवाएँ  बागवानी हो गयी !
प्रश्न उठते अब नयन बेटी सयानी हो गयी ! 1
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खिल सका उपवन हमारा,बेटियों के मान से,
हाँ बचाया कोख हमने पर अमानी हो गयी ।

आँधियों को दोष क्या दें घर हमारे ढह गये,
ढह गया आदर्श जब बेटी बचानी हो गयी ! 2

धर्म के आलय जहाँ उठतीं हया की बोलियाँ
रो रही क्यों अस्मिता खो आज पानी हो गयी !  3

दिन उजाले को बनाते हैं अमावस क्यों घना,
रात की छाया डराती  सी जवानी हो गयी ! 4

खोल दी हमने किताबें आज करुणा प्रेम की,
छल प्रपंचों की कथा सुननी सुनानी हो गयी !  5
                डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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