Friday, January 25, 2019

शीर्षक  ---सफर/ यात्रा / भ्रमण
सफर हो अकेला सताता बहुत है ।
तनिक फासले को दिखाता बहुत है।

कहीं दूरियाँ हम मिटाने चले  जो,
जिसे चाहता मन रुलाता  बहुत है। 

जहाँ पास बैठा बने अजनबी वह,
मिली देख नजरें चुराता बहुत है ।

न यात्रा सफल बिन सहारे कहीं भी,
मिलन हो क्षितिज सा सुहाता बहुत है।

न मीलों थकन मीत मन का मिले जो,
रसिक  रागिनी बन  रिझाता  बहुत है ।

लगन साधना में यती बन चला जो,
भ्रमण भोग जीवन सिखाता बहुत है ।
             
झुका कर नजर मौन देता निमंत्रण,
हया प्रेम हो  मन लुभाता बहुत है  ।
                 डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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