शीर्षक ---सफर/ यात्रा / भ्रमण
सफर हो अकेला सताता बहुत है ।
तनिक फासले को दिखाता बहुत है।
कहीं दूरियाँ हम मिटाने चले जो,
जिसे चाहता मन रुलाता बहुत है।
जहाँ पास बैठा बने अजनबी वह,
मिली देख नजरें चुराता बहुत है ।
न यात्रा सफल बिन सहारे कहीं भी,
मिलन हो क्षितिज सा सुहाता बहुत है।
न मीलों थकन मीत मन का मिले जो,
रसिक रागिनी बन रिझाता बहुत है ।
लगन साधना में यती बन चला जो,
भ्रमण भोग जीवन सिखाता बहुत है ।
झुका कर नजर मौन देता निमंत्रण,
हया प्रेम हो मन लुभाता बहुत है ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
सफर हो अकेला सताता बहुत है ।
तनिक फासले को दिखाता बहुत है।
कहीं दूरियाँ हम मिटाने चले जो,
जिसे चाहता मन रुलाता बहुत है।
जहाँ पास बैठा बने अजनबी वह,
मिली देख नजरें चुराता बहुत है ।
न यात्रा सफल बिन सहारे कहीं भी,
मिलन हो क्षितिज सा सुहाता बहुत है।
न मीलों थकन मीत मन का मिले जो,
रसिक रागिनी बन रिझाता बहुत है ।
लगन साधना में यती बन चला जो,
भ्रमण भोग जीवन सिखाता बहुत है ।
झुका कर नजर मौन देता निमंत्रण,
हया प्रेम हो मन लुभाता बहुत है ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
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