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गीतिका - छंद सार
लिख लिख भेजा पाती तुमको,मैंने रीति निभाई ।
सच माना अब मैंने प्रियतम , होती प्रीति पराई ।
राग छेड़ती तनमन जारे, नैना यह पथराये ।
अँसुवन की माला मैं गूँथूँ, उर में अगन लगाई ।
कोरा कागज था मन मेरा,लिख कर नाम तिहारा ,
नींदिया वैरन लागे अबतो, जागत रहत सताई ।
पूछ रही माथे की बिंदिया, कंगना शोर मचावे,
बीच भँवर में छोड़ गये क्यों,मन में आस जगाई ।
विरह विकल मँह इत उत डोले,मन पंछी घबराये,
दीरघ सांस भरे मति भोरी, कैसी प्रीति बनाई ।
रात लगे अब स्याह साँवरे, टिम टिम जरे वियोगन,
जब लगि आवे प्रेम सँदेसा,रार करे अँगनाई ।।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी
गीतिका - छंद सार
लिख लिख भेजा पाती तुमको,मैंने रीति निभाई ।
सच माना अब मैंने प्रियतम , होती प्रीति पराई ।
राग छेड़ती तनमन जारे, नैना यह पथराये ।
अँसुवन की माला मैं गूँथूँ, उर में अगन लगाई ।
कोरा कागज था मन मेरा,लिख कर नाम तिहारा ,
नींदिया वैरन लागे अबतो, जागत रहत सताई ।
पूछ रही माथे की बिंदिया, कंगना शोर मचावे,
बीच भँवर में छोड़ गये क्यों,मन में आस जगाई ।
विरह विकल मँह इत उत डोले,मन पंछी घबराये,
दीरघ सांस भरे मति भोरी, कैसी प्रीति बनाई ।
रात लगे अब स्याह साँवरे, टिम टिम जरे वियोगन,
जब लगि आवे प्रेम सँदेसा,रार करे अँगनाई ।।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी
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