Monday, January 28, 2019

छंद - वाचिक भुजंगप्रयात
मापनी- 122 122 122 122
समान्त - आना, अपदान्त

गीतिका
महकता स्वयं सत्य बीड़ा  उठाना ।
मिले कीर्ति मन में नहीं दंभ लाना ।

तपें स्वर्ण बनकर निखरते तभी हम,
तनिक आपदा में  नहीं  हार जाना।

सुमन हर कली पर सजी ओस मोती,
उठो संग दिनकर तुम्हें पथ सजाना ।

न शीतल हिना हो न चंदन महकता,
महकती मनुजता इसे तुम  बनाना ।

सजे कर्म  निष्काम होते जहाँ वह,
नहीं अर्थ केवल  हमें हो  कमाना ।

सजे प्रेम तन-मन कटे सार जीवन,
बँधे बंधनों में  हमें वे  निभाना ।
          डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

No comments:

Post a Comment