Saturday, April 13, 2019

माँ

मापनी- गालगागा गालगागा गालगागा गालगा
समान्त - आर, पदांत - माँ
गीतिका
दीप हाथों में लिए मैं  तो  खड़ी हूँ द्वार माँ  ।
गीत भावों का सुनाऊँ कर उसे  स्वीकार  माँ ।

हे जगत जननी सहारा मान दो मुझको सदा,
चाहिए तेरा मुझे नित स्नेह का उपहार  माँ।

सुन पुकारे दीन की चहुँदिक छिड़ा संग्राम है, 
लो शरण में आज कर दो दुष्ट का संहार माँ ।

सिंह की करके सवारी पापियों का नाश कर, 
हो नहीं सकता तुम्हारे बिन सुखी संसार माँ । 

लाल चूनर माथ बिंदिया नैन बरसे प्रीति जो,
रूप गौरी प्रीति  की  धारो  वही शृंगार  माँ ।

कर रही विनती तुम्हारी दास मैं बन के सदा,
दो अमर वरदान वीरों को यही मनुहार  माँ ।

देश की माटी पुकारे पीर मन की जागती,
रत्न ऐसे देश हित मैं माँगती संस्कार माँ ।

प्रेम को सद्भाव को हमने भुलाया आज है,
मिट सके मतभेद दो आनंद की बौछार  माँ ।
                          डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Monday, January 28, 2019

छंद - वाचिक भुजंगप्रयात
मापनी- 122 122 122 122
समान्त - आना, अपदान्त

गीतिका
महकता स्वयं सत्य बीड़ा  उठाना ।
मिले कीर्ति मन में नहीं दंभ लाना ।

तपें स्वर्ण बनकर निखरते तभी हम,
तनिक आपदा में  नहीं  हार जाना।

सुमन हर कली पर सजी ओस मोती,
उठो संग दिनकर तुम्हें पथ सजाना ।

न शीतल हिना हो न चंदन महकता,
महकती मनुजता इसे तुम  बनाना ।

सजे कर्म  निष्काम होते जहाँ वह,
नहीं अर्थ केवल  हमें हो  कमाना ।

सजे प्रेम तन-मन कटे सार जीवन,
बँधे बंधनों में  हमें वे  निभाना ।
          डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Saturday, January 26, 2019

70वाँ गणतंत्र दिवस 2019

अभिनंदन ----
!!!70वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई !!!

आधार छंद- वाचिक भुजंगप्रयात
122  122  122 122
मापनी- लगागा लगागा लगागा लगागा

शहीदों नमन हिंद अपना सुहाना ।
शहादत तुम्हारी नहीं है भुलाना ।

कभी शीश अपना झुका जो नहीं है,
नजर से नजर तुम उठा कर मिलाना ।

मिले मान जीवन मिटाकर कुटिलता,
हमें नेक नीयत सदा  है  बनाना ।

लगे जो हया की कभी बोलियाँ तुम,
हृदय ज्वाल फूटे नहीं चुप  लगाना ।

घुटन भर रहीं राजनीतिक मिसालें,
सिसक तंत्र की है हमीं को मिटाना ।

सजी पालकी हो धरा ओढ़ चूनर,
हरित मातृ अंचल सदा तुम सजाना ।

शिखर भानु शुभ दिन सजाता रहेगा,
नवल क्रांति लेकर हमें पग बढ़ाना ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Friday, January 25, 2019


छंद - दिग् पाल
समांत - मुखड़ा - आएँ
अंतरा -- उन, अल, ऊटे, आसी --!
गीत -------

बिछुडे़ नहीं सुजन अब सपने नयन सजाएँ।
चाहत  यही  हमारी मिलती रहें  दुआएँ।

ऋतुराज आगमन हो गाती बहार गुन गुन,
राहें निखारतीं जो कलिका विलास रुनझुन,
महका करे चमन यह सजती रहे दिशाएँ ।
चाहत  यही  हमारी  मिलती रहें  दुआएँ।

उजड़े न माँग कोई सूना न मात आँचल,
खोये नआस बचपन आँसू बहे न काजल,
आतंक जो धरा पर जड़ से उसे  मिटाएँ ।
चाहत  यही  हमारी  मिलती रहें  दुआएँ।

सपने सँवारतीं वह  दर्पण  कभी न टूटे ,
निश्चित विजय हमारी यह हौसला न छूटे,
विश्वास हर हृदय में साहस यही दिलाएँ ।
चाहत  यही  हमारी, मिलती रहें  दुआएँ।

अनुभूति नेह की हो रंचक न हो उदासी,
सदियाँ से है निहारे यह प्रेम छंद प्यासी,
अनमोल है नयन के आँसू नहीं बहाएँ ।
चाहत  यही  हमारी  मिलती रहें  दुआएँ।             
                डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
----
 छन्द- किरीट सवैया (मापनीयुक्त वर्णिक)
वर्णिक मापनी - 211 211 211 211 211 211 211 211
अथवा लगावली- गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल
पारंपरिक सूत्र - भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस (अर्थात भ भ भ भ भ भ भ भ)

एक नदी द्वय पाट सदा सम भाग्य नहीं सुख पावन मोहक ।
पार लगा जन जीवन को तरणी जल नृत्य लुभावन मोहक ।
सत्य यही जन भूल न हो तन श्वांस रहे जग रीत सुधाकर ।
दास सदा भव भीत रहे मन आस जगा नव जीत सुधाकर 

सोहत छंद किरीट लुभावन मस्तक  शोभित भाल
हिमालय ।
मुग्ध करे मन शृंग सुहावन चादर श्वेत कपाल हिमालय ।
सागर पाँव पखार रहा करती लहरें करताल  हिमालय ।
रक्षक भारत भूमि सखा वत जीवन का प्रतिपाल हिमालय ।

दीन नहीं मजबूर नहीं मन से न फकीर  अधीर बनें अब।
घेर रहा कलिकाल उसे हम खींच लकीर सुवीर बनें अब ।
हाथ मशाल उठा निकलें हम धर्म धरा पर भीर हरें सब ।
झूम बयार बसंत चले दुखदायक जीवन  पीर हरें सब ।                           
                           डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
 -lll
            गीतिका - छंद सार
लिख लिख भेजा पाती तुमको,मैंने रीति निभाई ।
सच माना अब मैंने  प्रियतम ,  होती प्रीति पराई ।

राग छेड़ती तनमन जारे,  नैना यह पथराये ।
अँसुवन की माला मैं गूँथूँ, उर में  अगन लगाई ।

कोरा कागज था मन मेरा,लिख कर नाम तिहारा ,
नींदिया वैरन लागे अबतो, जागत रहत सताई ।

पूछ रही माथे की बिंदिया, कंगना शोर मचावे,
बीच भँवर में छोड़ गये क्यों,मन में आस जगाई ।

विरह विकल मँह इत उत डोले,मन पंछी घबराये,
दीरघ सांस भरे मति भोरी, कैसी प्रीति बनाई ।

रात लगे अब स्याह साँवरे, टिम टिम जरे वियोगन,
जब  लगि आवे प्रेम सँदेसा,रार करे अँगनाई ।।
                           
                                         डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी
शीर्षक  ---सफर/ यात्रा / भ्रमण
सफर हो अकेला सताता बहुत है ।
तनिक फासले को दिखाता बहुत है।

कहीं दूरियाँ हम मिटाने चले  जो,
जिसे चाहता मन रुलाता  बहुत है। 

जहाँ पास बैठा बने अजनबी वह,
मिली देख नजरें चुराता बहुत है ।

न यात्रा सफल बिन सहारे कहीं भी,
मिलन हो क्षितिज सा सुहाता बहुत है।

न मीलों थकन मीत मन का मिले जो,
रसिक  रागिनी बन  रिझाता  बहुत है ।

लगन साधना में यती बन चला जो,
भ्रमण भोग जीवन सिखाता बहुत है ।
             
झुका कर नजर मौन देता निमंत्रण,
हया प्रेम हो  मन लुभाता बहुत है  ।
                 डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, January 13, 2019

 गीतिका (आधार छंद 'गीतिका' )
2122  2122  2122  212 अथवा
गालगागा गालगागा गालगागा गालगा
समान्त- आनी, पदान्त - हो गयी


बह रहीं कैसी हवाएँ  बागवानी हो गयी !
प्रश्न उठते अब नयन बेटी सयानी हो गयी ! 1
---------------------

खिल सका उपवन हमारा,बेटियों के मान से,
हाँ बचाया कोख हमने पर अमानी हो गयी ।

आँधियों को दोष क्या दें घर हमारे ढह गये,
ढह गया आदर्श जब बेटी बचानी हो गयी ! 2

धर्म के आलय जहाँ उठतीं हया की बोलियाँ
रो रही क्यों अस्मिता खो आज पानी हो गयी !  3

दिन उजाले को बनाते हैं अमावस क्यों घना,
रात की छाया डराती  सी जवानी हो गयी ! 4

खोल दी हमने किताबें आज करुणा प्रेम की,
छल प्रपंचों की कथा सुननी सुनानी हो गयी !  5
                डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी